बच्चों को कब डांटना नहीं चाहिए? जानिए जो उनकी पढ़ाई और दिमाग पर असर डालते हैं?
परिचय
अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा न सिर्फ पढ़ाई में अच्छा करे, बल्कि एक खुश और आत्मविश्वासी इंसान बने, तो आज से ही डांट की जगह समझ को जगह देना शुरू करें।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, कुछ ऐसे मौके होते हैं जब बच्चों को कब डांटना नहीं चाहिए यह समझना हर माता-पिता के लिए बेहद जरूरी है। इस लेख में हम जानेंगे बच्चों को कब डांटना नहीं चाहिए? जानिए जो उनकी पढ़ाई और दिमाग पर असर डालते हैं? क्योंकि रोजमर्रा की भागदौड़, तनाव, ऑफिस की थकान और घर की जिम्मेदारियों के बीच कई बार धैर्य जवाब दे जाता है। ऐसे में बच्चे की किसी छोटी-सी गलती पर भी गुस्सा निकल जाता है और हम उसे डांट बैठते हैं। इन समयों पर डांटने से न सिर्फ उसका मन दुखता है, बल्कि उसका सीखने का तरीका, सोचने का ढंग और पढ़ाई में परफॉर्मेंस भी प्रभावित हो सकती है।मनोविज्ञान साफ कहता है कि बच्चों की खुशी सिर्फ सुविधाओं से नहीं, बल्कि माता-पिता के व्यवहार से बनती या बिगड़ती है।
बच्चों को कब डांटना नहीं चाहिए? जानिए जो उनकी पढ़ाई और दिमाग पर असर डालते हैं?
डांट का बच्चों की पढ़ाई और दिमाग पर क्या असर पड़ता है?
लगातार डांट सुनने वाला बच्चा धीरे धीरे
- खुद पर भरोसा खोने लगता है
- सवाल पूछने से डरने लगता है
- नई चीजें सीखने से कतराने लगता है
- पढ़ाई को बोझ समझने लगता है
- और कई बार झूठ बोलने की आदत भी डाल लेता है
यही वजह है कि बच्चों की पढ़ाई पर डांट का असर बहुत गहरा और लंबे समय तक रहने वाला होता है,डांट का पढ़ाई और मानसिक विकास पर क्या असर पड़ता है? यानी जो आप उसे बेहतर बनाने के लिए कर रहे होते हैं, वही चीज उसे अंदर से कमजोर बना रही होती है। तो फिर बच्चों को कैसे सुधारें? बच्चों को इन मौकों पर बिल्कुल भी न डांटे :-
1. जब बच्चा कुछ नया सीखने की कोशिश कर रहा हो
जब बच्चा साइकिल चलाना, लिखना, पढ़ना या कोई नई स्किल सीखता है, तो गलतियां होना बिल्कुल सामान्य है। बहुत से माता-पिता यहां गलती कर बैठते हैं। जैसे ही बच्चा बार-बार गलती करता है, वे झुंझला जाते हैं और कह देते हैं:
“तुमसे कुछ नहीं होगा”, “इतनी आसान चीज भी नहीं आती”, “देखो फलां बच्चा कितना अच्छा करता है।”ऐसे शब्द बच्चे के मन में गहरे बैठ जाते हैं। वह खुद को कमजोर समझने लगता है और कोशिश करना ही छोड़ देता है।
सही तरीका:बच्चे की कोशिश की तारीफ करें, न कि सिर्फ रिजल्ट की।उसे बताएं कि गलती करना सीखने का हिस्सा है।
धैर्य रखें और उसे समय दें। ध्यान रखें, आज अगर आप उसे हौसला देंगे, तो वही बच्चा कल आपसे आगे निकल सकता है।
2. भावनाओं को नज़र अंदाज़ करना
कई बार बच्चे किसी बात से डरे होते हैं। जैसे –
- स्कूल में टीचर ने कुछ कह दिया
- परीक्षा का डर
- किसी दोस्त से झगड़ा
- अंधेरे से डर
- या फिर कोई बुरा सपना
ऐसे समय में अगर बच्चा रो रहा है या चुप-चाप सहमा बैठा है और आप उस पर चिल्ला दें:,रोना बंद करो”, “इसमें क्या रोने वाली बात है?”, “तुम बहुत ज़्यादा सोचते हो,जब बच्चे की भावनाओं को बार-बार खारिज किया जाता है, तो वह अपनी फीलिंग्स को दबाना सीख जाता है। बड़े होकर ऐसे लोग या तो अपनी भावनाएं समझ ही नहीं पाते, या फिर अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं।
सही तरीका: बच्चे की फीलिंग्स को नाम दें, समझें और उसे बताएं कि जो वह महसूस कर रहा है, वह गलत नहीं है।
- पहले उसकी बात ध्यान से सुनें।
- उसे भरोसा दिलाएं कि आप उसके साथ हैं।
- उसके डर को छोटा न समझें, भले ही वह आपको बेवजह लगे।
जब बच्चा यह महसूस करता है कि उसके माता-पिता उसे समझते हैं, तो वह अंदर से मजबूत बनता है।
3.जब बच्चा किसी गलती पर पहले से शर्मिंदा हो
अक्सर ऐसे मामलों में बच्चा पहले से ही डरा और शर्मिंदा होता है। वह जानता है कि उससे गलती हुई है। ऐसे में अगर आप उसे जोर-जोर से डांटेंगे, तो वह अपनी गलती मानने से भी डरने लगेगा। अगर आप उसे और डांट देंगे, तो वह भविष्य में सच बताने से डरने लगेगा। धीरे-धीरे वह आपसे बातें छुपाने लगेगा। यही से झूठ बोलने की आदत शुरू होती है।
सही तरीका:
- शांत होकर पूरी बात सुनें
- गलती सुधारने पर फोकस करें
- बच्चे को बुरा नहीं, गलती को गलत बताएं
- सजा देने से ज्यादा जरूरी है उसे सही रास्ता दिखाना।
याद रखें, आपका मकसद बच्चे को बेहतर इंसान बनाना है, उसे डरपोक नहीं।
4. जब बच्चा दूसरों से तुलना के कारण टूट रहा हो
ऐसी बातें अक्सर गुस्से या निराशा में निकल जाती हैं, लेकिन इनका असर बहुत गहरा होता है। बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है। उसे लगता है कि वह कभी अच्छा नहीं बन सकता। इसका सीधा असर उसकी पढ़ाई और आत्मविश्वास पर पड़ता है। कई बच्चे तो अंदर ही अंदर कुंठित होकर चुप हो जाते हैं, और कुछ जिद्दी या चिड़चिड़े बन जाते हैं।
सही तरीका:
- बच्चे की तुलना सिर्फ उसी से करें जैसा वह पहले था।
- उसकी छोटी-छोटी प्रगति की तारीफ करें
- समझाएं कि हर बच्चा अलग होता है और हर किसी की अपनी रफ्तार होती है।
- जब बच्चा खुद पर भरोसा करना सीखता है, तभी वह सच में आगे बढ़ता है।
5. जब बच्चा बहुत ज्यादा थका हुआ या ओवरलोड महसूस कर रहा हो
आज के समय में बच्चों पर पढ़ाई का बोझ बहुत ज्यादा है। स्कूल, होमवर्क, ट्यूशन और एक्स्ट्रा क्लास… इससे बच्चा थक जाता है। ऐसे में अगर वह चिड़चिड़ा हो जाए, जल्दी गुस्सा करने लगे या किसी काम से मना कर दे, तो कुछ माता-पिता उसे आलसी या बदतमीज समझकर डांट देते हैं। लेकिन असल में वह मानसिक और शारीरिक रूप से थका हुआ होता है।
सही तरीका:
- उसे आराम करने दें,और खेलने का पूरा समय दें।
- खेलने और रिलैक्स करने का समय दें
- उसके मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही अहमियत दें
- बच्चे के रूटीन पर ध्यान दें।
- उसकी थकान को समझें, न कि उसे नाटक समझें।
- गुस्से में बात न करें, पहले खुद शांत हों
- बच्चे से आंखों में आंख डालकर बात करें
- उसकी बात पूरी सुनें
- गलती समझाएं, बच्चे को बुरा न बताएं
- सही काम करने पर उसकी तारीफ जरूर करें
- उसके मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही अहमियत दे
6. बहुत ज़्यादा उम्मीदें रखना
हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा कुछ बड़ा करे। लेकिन जब उम्मीदें बच्चे की क्षमता या इच्छा से बहुत आगे निकल जाती हैं, तो वह लगातार प्रेशर में जीने लगता है। उसे लगता है कि वह कभी माता-पिता को खुश नहीं कर पाएगा। यही सोच धीरे-धीरे उसे अंदर से तोड़ देती है।
सही तरीका: बच्चे की रुचि और क्षमता को समझें। सपने दिखाइए, बोझ नहीं।
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7.खुद हर समय नेगेटिव रहना
बच्चे अपने माता-पिता को देखकर ही दुनिया को देखने का तरीका सीखते हैं। अगर घर में हर समय शिकायत, डर, निराशा और गुस्सा रहता है, तो बच्चा भी वही सीखता है। वह दुनिया को एक खतरनाक और दुखी जगह मानने लगता है।
सही तरीका: परफेक्ट बनना जरूरी नहीं, लेकिन अपने एटीट्यूड पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।
8.“हम ही सब जानते हैं” वाला रवैया
कुछ माता-पिता मानते हैं कि बच्चा छोटा है, उसे कुछ नहीं पता। उसकी राय, उसकी पसंद, उसकी सोच को कोई अहमियत नहीं दी जाती। ऐसे माहौल में बच्चा या तो बहुत रिबेल बन जाता है, या फिर बहुत दबा हुआ और डरा हुआ। कोई भी माता-पिता परफेक्ट नहीं होता। हम सब से गलतियां होती हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि पेरेंटिंग एक सीखने की प्रक्रिया है, कोई एग्जाम नहीं। अगर आप आज से ही अपने रवैये में थोड़ा सा भी बदलाव लाते हैं, तो आपके बच्चे की पूरी दुनिया बदल सकती है।
सही तरीका: बच्चे को इंसान की तरह ट्रीट करें, सिर्फ “प्रोजेक्ट” की तरह नहीं।आपका व्यवहार ही बच्चे की अंदरूनी आवाज बनता है। उसे प्यार, भरोसा और समझ की आवाज दीजिए… डर और दबाव की नहीं।
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9. प्यार को शर्तों से जोड़ना
जब माता-पिता सिर्फ अच्छे नंबर, अच्छी हरकत या आज्ञाकारिता पर ही प्यार दिखाते हैं, तो बच्चा यह सीख लेता है कि “मुझे प्यार पाने के लिए परफेक्ट होना पड़ेगा।” ऐसे बच्चे अंदर से हमेशा डरे रहते हैं कि अगर गलती हो गई तो उन्हें स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सही तरीका: बच्चे को यह भरोसा दें कि आपका प्यार उसके रिजल्ट या परफॉर्मेंस पर निर्भर नहीं करता।
निष्कर्ष:
बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं। आप जैसे शब्दों से उन्हें गढ़ेंगे, वे वैसे ही बनेंगे। अगर आप बार-बार कहेंगे “तुमसे नहीं होगा”, तो वह सच में मान लेगा कि उससे नहीं होगा। लेकिन अगर आप कहेंगे: “तुम कर सकते हो, मैं तुम्हारे साथ हूं” तो वही बच्चा पहाड़ जैसी मुश्किल भी पार कर लेगा। आपने इस लेख में जाना बच्चों को कब डांटना नहीं चाहिए? जानिए जो उनकी पढ़ाई और दिमाग पर असर डालते हैं? इसलिए याद रखें, समझदार माता-पिता बच्चे का भविष्य बनाते हैं, और गुस्सैल रवैया उसका आत्मविश्वास तोड़ देता है। इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य मार्गदर्शन हेतु है l कोर्सेज से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी संबंधित संस्थानों की वेबसाइट पर जाकर अवश्य जांचे l आपको यह लेख कैसा लगा इसके बारे में अपने कमेंट्स लिखें और अपने दोस्तों को शेयर करें l
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQ
1. बच्चों को किन मौकों पर डांटना नहीं चाहिए?
उत्तर:
जब बच्चा कुछ नया सीख रहा हो, डरा हुआ हो, किसी गलती पर शर्मिंदा हो, बहुत थका हुआ हो या खुद को दूसरों से कम समझ रहा हो, इन मौकों पर उसे डांटना नहीं चाहिए।
2. क्या ज्यादा डांटने से बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ता है?
उत्तर:
हां, ज्यादा डांटने से बच्चे का आत्मविश्वास कमजोर होता है, वह सवाल पूछने से डरने लगता है और धीरे-धीरे पढ़ाई में उसकी रुचि भी कम हो जाती है।
3. बच्चों को डांटने की जगह कैसे समझाएं?
उत्तर:
बच्चे से शांति से बात करें, उसकी बात पूरी सुनें, गलती समझाएं और सही तरीका बताएं। गुस्से की बजाय बातचीत ज्यादा असरदार होती है।
4. बच्चों का आत्मविश्वास कैसे बढ़ाया जा सकता है?
उत्तर:
उनकी कोशिशों की तारीफ करें, दूसरों से तुलना न करें, उनकी बातों को महत्व दें और हर छोटी सफलता पर उन्हें प्रोत्साहित करें।
5. क्या बच्चों की तुलना करना नुकसानदायक होता है?
उत्तर:
हां, तुलना करने से बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है, जिससे उसका आत्मविश्वास और मानसिक विकास दोनों प्रभावित होते हैं।
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